Sunday, February 10, 2019

हमारे शास्त्र ओर सतभगति

गीता जयंती पर अध्यात्मिक तोहफा

         जीव हमारी जाति है,मानव धर्म हमारा।
     हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, धर्म नही कोई न्यारा।।
हिंदुओं के शास्त्रों में पवित्र वेद में गीता विशेष है उनके साथ साथ अठारह पुराणों को भी समान दृष्टि से देखा जाता है श्रीमद्भागवत,सुधासागर, रामायण, महाभारत विशेष प्रमाणित शास्त्र में से हैं।विशेष विषय यह है कि जिन पवित्र शास्त्रों को हिंदुओं के शास्त्र कहा जाता है,जैसे पवित्र चारों वेद व पवित्र श्रीमद भगवत गीता जी आदि वास्तव में यह सब शास्त्र केवल पवित्र हिंदू धर्म के ही नहीं है यह शास्त्र महर्षि व्यास जी द्वारा उस समय लिखे गए थे जब कोई अन्य धर्म नहीं था इसलिए पवित्र वेद व पवित्र श्रीमद भगवत गीता जी तथा  पवित्र पुराण सर्वशास्त्र मानव मात्र के कल्याण के लिए है।

सर्व प्रथम पवित्र शास्त्र श्रीमद भगवत गीता जी पर विचार करते हैं
पवित्र श्रीमद भगवत गीता जी का ज्ञान किसने कहा ?

पवित्र श्रीमद भगवत गीता जी का ज्ञान उस समय बोला गया था जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था अर्जुन ने युद्ध करने से इनकार कर दिया था यह क्यों हो रहा था? इस युद्ध को धर्मयुद्ध की संख्या भी नहीं दी जा सकती क्योंकि दो परिवारों का सम्पति  वितरण का विषय था। कौरवों तथा पांडवों का सम्पति बटवारा नही  हो रहा था कौरवों ने पांडवो को आधा राज्य भी देने से मना कर दिया था दोनों पक्षों का बीच बचाव करने के लिए प्रभु श्री कृष्ण जी तीन बार शांतिदूत बनकर गए परन्तु  दोनों ही पक्ष अपनी अपनी जिद पर अटल थे ।श्री कृष्ण जी ने युद्ध से होने वाली हानि से भी परिचित कराते हुए कहा कि ना जाने कितनी बहन विधवा होगी ना जाने कितने बच्चे अनाथ होंगे महापाप के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। युद्ध में ना जाने कौन मरे कौन बच्चे तीसरी बार जब श्री कृष्ण जी समझौता करवाने गए तो दोनों पक्षों ने अपने-अपने पक्ष वाले राजाओं की सेना सहित सूची पत्र दिखाया तथा कहा कि इतने राजा हमारे पक्ष में हैं बताया इतने हमारे पक्ष में जब श्री कृष्ण जी ने देखा कि दोनों एक पक्ष  टस से मस नहीं हो रहे हैं।युद्ध के लिए तैयार हो चुके हैं। तब श्री कृष्ण जी के सोचा कि एक दाव ओर है वह भी आज लगा देता हूँ। युद्ध के लिए तैयार हो चुके है । तब श्री कृष्ण जी ने सोचा की कही पांडव मेरी सम्बन्धी होने के कारण अपनी जिद्द इसलिए न छोड़ रहे हो कि श्री कृष्ण हमारे साथ है , विजय हमारी ही होगी (क्योंकि श्री कृष्ण जी की बहन सुभद्रा जी का विवाह श्री अर्जुन जी से हुआ था) श्री कृष्ण जी ने कहा  की एक तरफ मेरी सर्व सेना होगी और दूसरी तरफ में होऊंगा ओर इसके साथ साथ मे वचन बद्ध भी होता हूं कि में हथियार नही उठाऊँगा। इस घोषणा से पांडवो के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उनको लगा कि अब हमारी पराजय निशित  है। यह विचार कर पाँचो पाण्डव यह कह कर सभा से बाहर आने की पार्थना की । श्री कृष्ण जी के बाहर आने पर पांडवो ने कहा कि हे भगवान हमे पांच गाँव दिलवा दो। हम युद्ब नही चाहते है। हमारी इज्जत भी रह जायेगी और आप चाहते है कि युद्ध न हो, यह भी टल जायेगा । श्री कृष्ण से अपनी राय बताकर अपने घर चले गए

पांडवो के इस फैसले से श्री कृष्ण जी बहुत खुश हुए तथा सोचा की बुरा समय टल गया। श्री कृष्ण जी वापिस आए,सभा मे केवल कौरव तथा उनके समर्थक शेष रहे।  श्री कृष्ण जी ने कहा दुर्योधन युद्ध टल गया है मेरी भी हार्दिक इच्छा थी। आप पांडवों को 5 गांव दे दो वह कह रहे हैं कि हम युद्ध नहीं चाहते  दुर्योधन ने  कहा कि पांडवों के लिए सुई की नोक तुल्य जमीन नहीं है यदि उन्हें राज्य चाहिए तो युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में आ जाए इस बात से श्री कृष्ण जी ने नाराज होकर कहा कि दुर्योधन तू  इंसान नहीं शैतान है।कहां आधा राज्य और कहां पांच गाँव  मेरी बात मान ले पाँच गांव दे दे श्री कृष्ण से नाराज होकर दुर्योधन ने  सभा में उपस्थित योद्धयो  को आज्ञा दी की श्रीकृष्ण को पकड़र कारागर में डाल दो आज्ञा मिलते ही योद्धाओ  ने  श्री कृष्ण को चारों तरफ से घेर लिया श्री कृष्ण जी ने अपना विराट रूप दिखाया। जिस कारण सर्व योद्धा और कौरव डर कुर्सियो  के नीचे घुस गई तथा शरीर के तेज प्रकाश से  आंखें बंद हो गई। कृष्ण जी वहां से निकल गए

Saturday, February 9, 2019

हमारे शास्त्र ओर सतभगति

"श्रीमद् भगवत गीता सार"

 परमेश्वर की खोज मैं आत्मा युगों से लगी है जैसे प्यासे को जल  की चाह होती |है जीवात्मा परमात्मा से बिछड़ने के पश्चात महा कष्ट जेलर रही है जो सुख पूर्ण परमात्मा के सतलोक में था वह सुख यहां काल प्रभु के लोक में नहीं है चाहे कोई करोड़पति है, चाहे पृथ्वीपति(सर्व पृथ्वी का राजा),चाहे सुरपति (स्वर्ग का राजा) ,चाहे श्री ब्रम्हा ,श्री विष्णु ,तथा श्री शिव त्रिलोकपति  है
 इसलिए श्रीमद भगवत गीता के ज्ञान दाता प्रभु ने अध्याय 15 के श्लोक 1 से 4 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है की अर्जुन सर्व भाव से उस परमेश्वर की शरण में जा उसकी कृपा से ही तू परम शांति को तथा सतलोक को प्राप्त होगा उस परमेश्वर के तत्व ज्ञान वह  भक्ति मार्ग को मैं नहीं जानता उस तत्व ज्ञान को तत्वदर्शी संतो  के पास जाकर उनको दंडवत प्रणाम कर तथा विनम्र भाव से प्रश्न करें तब वह  तत्वदर्शी संत आपको परमेश्वर का तत्वज्ञान बताएंगे फिर उनके बताए भक्ति मार्ग पर सर्व भाव से लग जा (प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 34 देखे ) 
तत्वदर्शी संत की पहचान  गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में बताते हुए कहा है की यह संसार उल्टे लटके हुए वृक्ष की तरह है जिसके ऊपर को मूल तथा नीचे को शाखा है जो इस संसार रूपी वृक्ष को के विषय में जानता है वह तत्वदर्शी संत है, गीता अध्याय 15 श्लोक 2 से 4 में कहा है उस संसार रूपी वृक्ष कि तीनों गुण( रजोगुण ब्रह्मा , सतगुण विष्णु तमगुण शिव ) रूपी शाखा है । जो (स्वर्ग लोक ,पाताल लोक,तथा पृथ्वी लोक) तीनो लोको में ऊपर तथा नीचे फैली हुई है। उस संसार रूपी उल्टे लटके हुए  वृक्ष के विषय में अथार्त सृष्टि रचना के बारे में इस गीता जी के ज्ञान में में  नहीं बता पाऊंगा यहां विचार काल में जो (गीता ज्ञान)ज्ञान आपको बता रहा हूं, यह पूर्ण ज्ञान नहीं है,उसके लिए गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में संकेत किया है जिसमें कहा है कि पूर्ण ज्ञान के लिए तत्वदर्शी संत के पास जा ,वही बताएंगे मुझे पूर्ण ज्ञान नहीं है गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि तत्वदर्शी संत की प्राप्ति के पश्चात उस परम पद परमेश्वर (जिसके विषय में गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है की खोज करनी चाहिए) जहां जाने के पश्चात साधक पूर्ण लौट कर वापस नहीं अर्थात पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है जिस पूर्ण परमात्मा से उल्टे संसार रूपी वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है भावार्थ है कि जिस परमेश्वर ने सर्व ब्रह्मण्डों की रचना की है तथा में गीता ज्ञान देने वाला भी उसी आदि पुरुष परमेश्वर परमात्मा की शरण हु, उसकी साधना करने से अनादि मोक्ष (पूर्ण मोक्ष) प्राप्त होता है

देखिए  ऊपर जड़ नीचे शाखा  वाला उल्टा लटका हुआ संसार रूपी व्रक्ष का चित्र:-

नाम कोनसे राम का जपना है 


इस संसार मे दो प्रकार ओ भगवान है नाशवान ओर अविनासी ओर ये सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान ओर जीवात्मा अविनासी कहा जाता है 
गीता जी के अध्याय न.15 का श्लोक न.17
अनुवाद:- उत्तम भगवान तो अन्य ही है जो तीनों लोकों में प्रवेश कर के सब का धारण पोषण करता है अविनाशी परमेश्वर परमात्मा इस प्रकार कहा गया है
कबीर,अक्षर पुरुष एक पेड़ है ,निरजंन बाकी डार।
त्रिदेवा (बृह्मा,विष्णु,शिव)शाखा भये,पात रूप संसार।।



भगवान कोंन है

भगवान कबीर साहिब है जो चारो युगों में आते है 
सतगुरु पुरुष कबीर है,चारो युग परवान 
झूठे गुरुवा मर गए,हो गए भूत मसान।।



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अध्यात्म के अनसुलझे सवाल


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